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10.02.2009

जीवन चलचित्र नहीं; प्रेमचंद का उपन्यास है!


दो साल से मन में इच्छा थी की प्रेमचंद की गोदान पढूं | किताब किसीने दी भी | लेकिन २०-२५ पन्नों से आगे न बढ़ पाया | एक हफ्ते पहले  वैष्णोदेवी जाते हुए वही किताब  फिर से खरीदी - और इस बार पढ़ी | बहुत सुना  था गोदान के बारे में  "हिंदी साहित्य की एक महान रचना"| पढ़कर पता चला ऐसा क्यों कहते हैं |


प्रेमचंद जी ने भारत के गाँव का जो हाल बताया है उस्के बारे में हम में से कईयों ने पढ़ा और सुना होगा | परन्तु अगर उस हालात के दर्द और बेबसी का बयान अगर किसी ने इस तरह बताया हो जिससे हम जैसे भी उस वेदना को महसूस कर सकें तो वह प्रेमचंद ही हैं | व्यक्ति की मनः स्तिथि और मनो दशा का वर्णन जैसे उन्होंने किया है उसे देख के  लगता है ऐसा कुछ अपने साथ भी घटा है |


गोदान कहानी है होरी की | एक ऐसा किसान जिसने जीवन में कभी भी सुख न देखा | हमेशा सुख की एक मृगतृष्णा थी जिसका पीछा करते उसने जीवन बिताया और अंत में प्राण भी त्यागे |
विभिन्न प्रसंगों की मदद लेके प्रेमचंद धन संचै को जीवन का परमार्थ बनाने वालों की मूर्खता दिखाते हैं | बहुत सालों बाद मैंने हिंदी में कोई उपन्यास या किताब पढ़ी है | और इस उपन्यास ने मुझे हिंदी में पढने का एक बड़ा मज़बूत कारन दिया है |


अगर आपने गोदान पढ़ी है तो अपनी प्रतिक्रिया दीजिये | अगर नहीं पढ़ी है तो ज़रूर पढिये |
आखरी पन्ना पढ़के तो आँखों में आँसू आना निश्चित है |